“सब चशमिश हैं”-Hindi Bytes

1- जब अर्थ से अधिक इरादों पर चोट हो, तुम समझ जाना चशमिश हो|

“आँखें अंधी हो जाती हैं रोशनी खोकर, पर मन की आखें कभी रोशनी नहीं खोतीं|”

वास्तव में जिसे हम “समझ” या “ब्यक्तिगत राय” का नाम देते हैं, वह इसी चश्मे का कमाल है| यदि सोनू निगम के अज़ान पर लिखे ट्वीट पढ़ते ही आपने उसके संप्रदाय का आंकलन किया, आपके चश्मे का कारीगर कोई धर्म-विशेष का ज्ञानी रहा होगा| और यदि भारत को गरीब कहने वाला आपको घमंडी और मूर्ख लगा, आपके चश्मे का उत्पादक कोई “सच्चा” देशभक्त ही रहा होगा|

जो सर्वविदित है, वही चश्मा है| ये संसार एक बाज़ार है, जहां अनेक चश्मे बिकते हैं| इन चश्मों का दाम सिर्फ आपका ध्यान है, और यही ध्यान जिसे ज़्यादा मिले वही चश्मा महंगा है| यह ना सिर्फ एक व्यक्तिगत वस्तु है, परंतु अच्छे/बुरे होने का सामाजिक पैमाना भी है| यदि हिन्दी का ब्लॉग देखते ही ध्यान ना लगे, तो चश्मे का कमाल; और यदि अँग्रेजी की वैबसाइट में हिन्दी कुछ आकर्षक सी जान पड़े, तो भी इसी चश्मे का कमाल| अर्थात, अर्थ का पनपना या जाग्रत होना इसी के द्वारा होता है| यदि ये ना रहे तो स्वयं की प्रतिक्रियाएँ पनपती नहीं, और कहनी या करनी के पीछे के इरादों पर भी ध्यान नहीं जाता|

कोई कहता है गुलाम अली क्या गाता था! वहीं कोई कहता है उस पाकिस्तानी का नाम न लो, जबकि चुपके-चुपके रात-दिन उसके मधुर गीत गुनगुनाता था| अर्थ का अनर्थ भी तभी जान पड़ता है जब भिन्न चश्मे की परतों से एक ही नज़ारा देखा जाए| हालांकि, चश्मा होने पर अक्सर ही सामने वाले के इरादों को समझने में भूल हो जाती है| जैसे की मौलवी जी सोनू को मुस्लिम विरोधी समझ बैठे, जबकि इरादे कुछ भिन्न थे| ऐसे ही हम भी अपनी मान्यताओं के बूते हर दिन किसी ना किसी का आंकलन करते हैं|

2- चश्मा मान्यता है, यथार्थ नहीं|

भौतिक चश्मे और मन के चश्मे में जो सबसे बड़ा फर्क है वह यही कि भौतिक चश्मा नज़ारे स्पष्ट करता है, जबकि मन का चश्मा अक्सर वही दिखाता है जिसे आप देखने की कोशिश करते हैं| उदहारण के तौर पर, मीडिया के चश्मे ने मोदी जी को ब्रांड बनाया तो वह सर्वव्यापी हो गए| कानपुर में बैठे ही गुजरात मॉडल का आंकलन हुआ, तो वहाँ भी उनकी लहर चली, और जनता के कुछ पसंदीदा चुनावों में पीछे रह गए| कहीं जीत पर मिठाइयाँ और बधाइयाँ बटीं, तो कहीं 5 सालों कि मेहनत रद्दी के भाव बिकी|

कौन कितना सच्चा है, कितना ईमानदार है, यह उसके सिवा कोई जान नहीं सकता– यह यथार्थ है|

नरेंद्र मोदी एक ईमानदार व्यक्ति है– यह उनके आचरण के प्रभाव से जगी एक मान्यता है|

जब मान्यताओं की परतें आधार बन जाएँ, यथार्थ मायने नहीं रखता| इसी को अँग्रेजी में judgemental होना कहते हैं| अपनी फिजा बनाना एक कला है, जिसके बूते संसार में आपका आंकलन होता है| इस संदर्भ में मोदी जी एक मंझे हुए कलाकार हैं| उनका असली व्यक्तित्व जानकार मुझे मिलेगा भी क्या, जब वो मुश्किलों में अपनी छाप अपने आप ही छोड़ेगा| और हाँ, जब तक चश्मा है कोई भी पूरी तरह ईमानदार या पूरी तरह सच्चा हो ही नहीं सकता, यह भी यथार्थ है|

3- सब चशमिश हैं

वास्तव में सभी अपनी-अपनी मान्यताओं को “समझदारी” का नाम देकर जीने लगे हैं| यदि मैं कहूँ मेरी वैबसाइट सबसे बेहतर है या मेरा लेखन सर्वश्रेष्ठ है, और यही किसी और की मान्यता हो, तो बहस में भले ही कोई भी बाज़ी मारे मगर स्पष्ट रूप से दोनों ही चशमिश रहेंगे|

“बहस का मूल रूप यही चश्मा है|”

सामने वाले की बात से इत्तेफाक ना रखना ही तो बहस है! यदि बहस सिर्फ और सिर्फ मूल रूप से की गई रिसर्च हो, तो बहस में से कड़वे कटाक्ष भी कम ही रहेंगे| ऐसे में दर्शकों को रस नहीं मिलेगा, जिस कारण बहस कारवाई जाती हैं| गौर करने वाली बात तो यह है की चश्मे के कारण अक्सर व्यक्तिगत टिप्पणियाँ न्यूज़ बन जाती हैं और आरोपों का सिलसिला सोश्ल साइट्स जा पहुंचता है|

“चश्मा ही inspiration है और यही चश्मा expression भी है|

यदि नज़रियों में टकराव हो तो समझ लेना चश्मे का ब्रांड भिन्न है, ना की दोनों के दिलों की धड़कन या पाचन प्रक्रिया| मैं ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि टकराव के कारण हम विरोधियों को इंसान ही नहीं समझते| कुंठा की विश-ग्रंथियों में जकड़े ऐसे मानव कितने intellectual होंगे और कितने समझदार, यह तो कोई अंधा भी बता सकता है|

तो अगली बार ज़रा गौर करना, चश्मे से नहीं बल्कि नंगी मन की आँखों से| क्योंकि सच की कड़वाहट से आँखें जलाना, ऐसी परतें लगाकर अंधापन जगाने से कई गुना वाजिब भी है, और उचित भी|

धन्यवाद||

Abhishek Shukla

Just a creative writer, with high aspirations for gbts.

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7 Responses

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